मुठ्ठी भर बस लकीरें ही..लकीरें है... कोई धुंधली सी , कोई गहरी सी, कोई चिठ्ठी की तरह दरवाजे दरवाजे पता dundati है कोई मोबाइल की तरह एक पल में saari बात कहती है
कोई national highway सी कोई गाव की पगडण्डी सी कोई भूल भुलैया सी कोई समंदर में नैया सी कोई डोर सी पतंग उड़ाती है कोई कट सी जाती है कोई घबराई सी है पहले इजहार सी कोई लम्बी तकरार सी........... कोई दुलार सी कोई बस प्यार सी……………….. मुठ्ठी भर लकीरें ही लकीरें है
जरा सा बाजार है बाकि सब बाजारू ग्लोबलाएजासन के दौर में बिक रही दारू
टी वी बहुत है सीरियल बहुत है बहुत है न्यूज पर ब्रेकींग न्यूज के चक्कर में सब खबर बाजारू
कौन-कौन है नेता वोट कौन है देता पैसा कोई उछालकर बड़े बड़े विज्ञापन है देता ख़ुशी के मारे फिर गरीब बाज़ार में होता जरा सा बाजार होता बाकि सब बाजारू बेचारा फिर हुआ बेआबरू............................. ।
थोडा सा रूठा करो थोडा मान जाया करो मान मऔअल का दौर चले फिर थोडा सा मुस्कुराया करो थोडा है खुलापन थोडा करो पर्दा मनो मेरी बात थोडा सा काजल भी लगाया करो जब छुए कोई हवा तुम्हे तो तो कोई बात नहीं जब आये हमारी याद तब थोडा तो सरमाया करो जब कधी आये तारो भरी रात उंगलियों से तारो को मिलकर मेरा नाम बनाया करो मेरे कदमो की आहट ना महसूस करो न सही मगर तुम दबे पावा न आया करो................................... ।