Ek pedh jo
Beprwah khada tha
dhoop ki chinta se door
Jid me magroor
Ghonsale ki parwah me
Wo bas khada tha
एक पेड़ जो
बेपरवाह खड़ा था
धूप की चिंता से दूर
ज़िद में मगरूर
घोंसले की परवाह में
वो बस खड़ा था
मन कुमार ( मनोज कुमार)
Ek pedh jo
Beprwah khada tha
dhoop ki chinta se door
Jid me magroor
Ghonsale ki parwah me
Wo bas khada tha
एक पेड़ जो
बेपरवाह खड़ा था
धूप की चिंता से दूर
ज़िद में मगरूर
घोंसले की परवाह में
वो बस खड़ा था
मन कुमार ( मनोज कुमार)
एक माटी भीगे क्यों है
कोई माली सींचे क्यों है
गीली ज़मीन तर बतर
मन इस कदर क्यों है
भीगता नहीं दिल
इस कदर गेरूआ क्यों है
छूटता नहीं रंग
अंग-ढंग फूहड़ सा क्यों है
लंबा सफर ख्वाब का
करवट का मोड़ इतना छोटा क्यों है
बड़ा रास्ता छोटा वास्ता
घर छिटक कर
दूर जाता क्यों है
इस बड़ी सी दुनिया में
मेरी माटी भीगे क्यों है
मन कुमार (मनोज कुमार)
रात जब छत पर टहल रहे थे
सोचा की चॉद की
खूबसूरती पर कुछ लिखा जाय
तो हुआ ये की
चॉद को घूरने लगे
घूरते-२ चॉद अब बड़ा लगने लगा
फिर आधा
फिर क्या चौक गए
अब तो दाग भी दिखने लगे
तभी एक हवाई जहाज अपनी लाईट
चालू किए गुजर रहा था
अब तो हद हो गई
उस हवाई जहाज
की एअर होस्टेज का ध्यान आया
तो पते की बात ये है
योग करना चािहए
योग से ध्यान लगा रहता हैl
दौड़ भाग
ऊचाई पर बैठा काग
बेसूरा हुआ राग
ठगे कौन ठाग
बड़े बड़े हैं दाग
राजनीति के भाग
पेट में जलें हैं आग
ये कौन सी चाल
लोकतंत के बाग में
बाघ घुस गये जनाब....जाग जागl
कभी...
अहसास जब चमक रहे थें
और जो कतार लगी थी
समय के साथ
आगे बड़ने की
जुगनुओं की भाति
अथाह काले सागर से
निकल आने के लिए
एक पर्व सा
उल्लास था
बस एक छलावा था
रात को रौशन करने के लिए
सुबह के गुबार के लिए.